(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.322. अध्यायः 322
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
याज्ञवल्क्येन जनकंप्रति प्राणिनामुत्क्रमणस्थानविशेषप्रयोज्यफलविशेषकथनम्॥ 1॥ तथा प्राणिनां मरणसूचक दुःशकुनकथनम्॥ 2॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

याज्ञवल्क्य उवाच। 12-322-0x(6514)(78369)
तथैवोत्क्रमतां स्थानं शृणुष्वावहितो नृप।
पद्भ्यामुत्क्रममाणस्य वैष्णवं स्थानमुच्यते॥ 12-322-1(78370)
जङ्घाभ्यां तु वसून्देवानाप्नुयादिति नः श्रुतम्।
जानुभ्यां च महाभागान्साध्यान्देवानवाप्नुयात्॥ 12-322-2(78371)
पायुनोत्क्रममाणस्तु मैत्रं स्थानमवाप्नुयात्।
पृथिवीं जघनेनाथ ऊरुभ्यां च प्रजापतिम्॥ 12-322-3(78372)
पार्श्वाभ्यां मरुतो देवान्नासाभ्यामिन्दुमेव च।
बाहुभ्यामिन्द्रमित्याहुरुरसा रुद्रमेव च॥ 12-322-4(78373)
ग्रीवया तु मुनिश्रेष्ठं नरमाप्नोत्यनुत्तमम्।
विश्वेदेवान्मुखेनाथ दिशः श्रोत्रेण चाप्नुयात्॥ 12-322-5(78374)
घ्राणेन गन्धवहनं नेत्राभ्यां सूर्यमेव च।
भ्रूभ्यां चैवाश्विनौ देवौ ललाटेन पितृनथ॥ 12-322-6(78375)
ब्रह्माणमाप्नोति विभुं मूर्ध्ना देवाग्रजं तथा।
एतान्युत्क्रमणस्थानान्युक्तानि मिथिलेश्वर॥ 12-322-7(78376)
अरिगनि प्रवक्ष्यामि विहितानि मनीषिभिः।
संवत्सराद्धिमोक्षस्तु संभवेत शरीरिणः॥ 12-322-8(78377)
योऽरुन्धतीं न पश्येत दृष्टपूर्वा कदाचन।
तथैव ध्रुवमतित्याहुः पूर्णेन्दुं दीपमेव च॥ 12-322-9(78378)
खण्डाभासं दक्षिणतस्तेऽपि संवत्सरायुषः।
परचक्षुषि चात्मानं ये न पश्यन्ति पार्थिवः॥ 12-322-10(78379)
आत्मच्छायाकृतीभूतं तेऽपि संवत्सरायुषः।
अतिद्युतिरतिप्रज्ञा अप्रज्ञा चाद्युतिस्तथा॥ 12-322-11(78380)
प्रकृतेर्विक्रियापत्तिः षण्मासान्मृत्युलक्षणम्।
दैवतान्यवजानाति ब्राह्मणैश्च विरुध्यते॥ 12-322-12(78381)
कृष्णश्यावच्छविच्छायः षण्मासान्मृत्युलक्षणम्।
शीर्णनाभिं यथा चक्रं छिद्रं सोमं प्रपश्यति॥ 12-322-13(78382)
तथैव च सहस्रांशुं सप्तरात्रेण मृत्युभाक्।
शवगन्धमुपाघ्राति सप्तरात्रेण मृत्युभाक्। 12-322-14(78383)
कर्णनासावनमनं दन्तदृष्टिविरागितां॥
कर्णनासावनमनं दन्तदृष्टिविरागिता॥ 12-322-15(78384)
संज्ञालोपो निरूष्मत्वं सद्योमृत्युनिदर्शनम्।
अकस्माच्च स्रवेद्यस्य वाममक्षि नराधिप॥ 12-322-16(78385)
मूर्ध्रतश्चोत्पतेद्धूमः सद्योमृत्युनिदर्शनम्।
एतावन्ति त्वरिष्टानि विदित्वा मानवोऽऽत्मवान्॥ 12-322-17(78386)
निशि चाहनि चात्मानं योजयेत्परमात्मनि।
प्रतीक्षमाणस्तत्कालं यः कालः प्रकृतो भवेत्॥ 12-322-18(78387)
अथास्य नेष्टं मरणं स्थातुमिच्छेदिमां क्रियाम्।
सर्वगन्धान्रसांश्चैव धारयीत समाहितः॥ 12-322-19(78388)
`तथा मृत्युमुपादाय तत्परेणान्दरात्मना।'
स साङ्ख्यधारणं चैव विदित्वा मनुजर्षभ।
जयेच्च मृत्युं योगेन तत्परेणान्तरात्मना॥ 12-322-20(78389)
गच्छेत्प्राप्याक्षयं कृत्स्नमजन्म शिवमव्ययम्।
शाश्वतं स्थानमचलं दुष्प्रापमकृतात्मभिः॥ ॥ 12-322-21(78390)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि द्वाविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः॥ 322॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-322-8 संवत्सरवियोगस्य संभवे नु इति ध. पाठः॥ 12-322-10 खण्डभागं दक्षिणत इति थ. पाठः॥ 12-322-13 छिद्रं छिद्रवन्तम्॥ 12-322-14 सुरभिद्रव्ये शवगन्धग्रह इत्यर्थः॥


Mahabharat- Hindi (Devanagari) 100000 shlokas

www.sanatanadharm.com - play store app (sanatana dharm)

"Bharathiya Sanatana Dharm" and Sanatana Dharmam & Dharmo rakshati Rakshitha logo are our trademarks. Unauthorised use of "Sanatana Dharmam & Dharmo rakshoati Rakshitha" and the logo is not allowed. Copyright © sanatanadharm.com All Rights Reserved . Made in India.